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Lalu Yadav ki Holi : लालू यादव की कुर्ता फाड़ होली, कमर में ढोलक और जुबान पर जोगीरा सरा रा रा रा रा

आज के दौर में लगभग सभी त्योहार हाई स्टैन्डर्ड हो गए है, मनाने के तौर तरीके भी बदल गए हैं. मगर होली का त्योहार तो आज भी गवई अंदाज में ही अच्छा लगता हैं. और जब बात होली की हो तो लालू यादव (Lalu Yadav) की कुर्ता फाड़ होली कैसे ना याद रहे.

लालू की होली का मतलब सब कुछ भूल जाने की होली… उल्लास की होली, लोक गीत, लौंडा नाच से लेकर बाकी वह सब कुछ होता था, जिसमें लालू डूब जाते थे. लालू की होली का मतलब कुर्ता फाड़ होली. इनकी होली में रंग-गुलाल से लेकर पुआ तक होता था. होली के दिन कार्यकर्ता से लेकर मंत्री तक सभी उनके सरकारी आवास पर पहुंचते थे. सुबह 10-11 बजे तक वह इनके बीच पहुंचते थे. उस दिन VVIP कल्चर को पूरी तरह किनारे रखकर कार्यकर्ता-नेता सब साथ में झूमते थे.


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लालू प्रसाद यादव की होली

गांव से जो होली खेली थी लालू यादव (Lalu Yadav) ने उसे पटना जाने के बाद भी उसे बरकरार रखा, उन्होंने अपनी उसी परंपरा को खोने नहीं दिया. 1990 के बाद जब वे CM बने तब उन्होंने इसे और लोकप्रिय बना दिया. 1990 से 1997 के दौरान जब वे सीएम रहे तब उन्होंने कुर्ता फाड़ होली की परंपरा को काफी लोकप्रिय बना दिया था.

वे CM हाउस के अहाते में ही होली मिलन का आयोजन करते थे. सुबह 7 बजे से ही लोग उनके आवास पर पहुंचने लगते थे. फाग के बीच रंग का दौर चलता था. इस दौरान वे अपने समर्थकों, कार्यकर्ताओं और नेताओं के साथ ढोल-मंजीरा लेकर बैठते थे और फाग गीत गाते थे. वहीं, लालू के आवास पर दोपहर होते-होते यह कार्यक्रम कुर्ता फाड़ होली में तब्दील हो जाता था. इसमें वहां मौजूद सभी लोग एक-दूसरे के कुर्ते फाड़ते थे. यहां तक कि लालू प्रसाद यादव का भी कुर्ता नहीं बचता था.

राबड़ी रंग डालती थीं, लालू होली गाते थे

राजद सुप्रीमो लालू यादव (Lalu Yadav) के आवास पर कुर्ता फाड़ होली नेता और कार्यकर्ताओं के बीच की औपचारिक दूरी को मिटाने की प्रतीक थी. शाम को अबीर-गुलाल और होली गायन होता था. होली के गीतों के बीच लालू प्रसाद यादव खुद ढोल बजाते थे. सबसे खास बात यह थी कि लालू गाते थे और राबड़ी देवी उनके ऊपर रंग डालती थीं. राबड़ी देवी भी नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ जमकर होली खेलती थीं.

नीतीश को तिलक लगाते थे लालू

लालू (Lalu Yadav) और नीतीश ( Nitish Kumar) जब संग होली खेलते तो एक-दूसरे को तिलक लगाते थे. दोनों मर्यादा का ख्याल रखते थे. लालू पत्रकारों को भी रंग डालने से नहीं चूकते थे. लालू के बयानों में, उनके रहन-सहन में उनके हर अंदाज में गांव का ठेठपन दिखता रहा है. होली में तो यह ठेठपन अपने पूरे उठान पर होता.

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