चुनाव चाहे किसी भी पद के लिए हो या किसी भी राज्य के विधानसभा का गृह मंत्री अमित शाह (Amit Shah) एक विशेष रणनीतिकार माने जाते रहे हैं. वे सफलता का रिकॉर्ड भले यूपी, हरियाणा और दिल्ली में कायम कर पाए पर बिहार उनके लिए पहले भी चुनौती रहा है. केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह (Amit Shah) 2 दिवसीय यात्रा पर 29 मार्च को बिहार आ रहे हैं. इस बार क्या होता है यह तो भविष्य बताएगा. पर बिहार अभियान का रिकॉर्ड उनके लिए खराब ही रहा है. जानते हैं बिहार के परिप्रेक्ष्य में कब और कहां चूकते रहे हैं अमित शाह.
सीमांचल अभियान और शाह
दरअसल, बिहार की जीत की परिकल्पना करने वाले अमित शाह ने नीतीश कुमार का साथ छोड़ते ही ये मान लिया कि सीमांचल के बिना भाजपा नीत सरकार बननी मुश्किल है. तब अमित शाह (Amit Shah) ने बड़ी ही सूक्ष्म अंदाज में बांग्लादेशी घुसपैठ का मसला उठाया. आतंकवादी का मसला उठाया. इस क्रम में सीमांचल का दौरा भी कई बार किया. उनका सीमांचल मिशन 2015 में मिली शिकस्त के बाद ही शुरू हुआ. सितम्बर 2022 में तो किशनगंज और पूर्णिया में जनसभा भी की.
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क्या रही रणनीति?
सूत्र बताते हैं कि सीमांचल में वे उत्तर प्रदेश के सहारनपुर वाले मॉडल पर चल पड़े. ऐसे में उन्हें पता था कि सीमांचल में मुस्लिम मतों की अधिकता है. जीत के फैक्टर भी बनते आ रहे हैं. दूसरा फैक्टर ये है कि अगर मुस्लिम उम्मीदवार न हो तब भी वे बीजेपी के उम्मीदवार को पसंद न कर लालू यादव या नीतीश कुमार के उम्मीदवार को करते हैं. ऐसे में उनका प्लान ये रहा कि विभिन्न पार्टियों में बंटे हिंदू जातियों को भगवाकरण किया जाए. और वे इस मॉडल पर उतर कर धरातल स्तर पर जातियों के बीच कार्य करने को हरी झंडी भी दिए.
सीमांचल में उठाया मुद्दा
अमित शाह (Amit Shah) ने सक्रियता के साथ सीमांचल में बांग्लादेशी घुसपैठ और आतंकवादी मुद्दे को उठाया गया पर तात्कालिक प्रभाव की जो अपेक्षा थी वो पूरी नहीं हुई. किशनगंज से कांग्रेस के मोहम्मद जावेद, पूर्णिया से पप्पू यादव, कटिहार से तारिक अनवर जीत गए. अमित शाह (Amit Shah) का सीमांचल अभियान फुस्स हो गया. याद कीजिए लोकसभा चुनाव 2024 के पूर्व का समय जब वे नीतीश कुमार पर काफी आक्रामक अंदाज में हमलावर थे. सम्राट चौधरी और विजय सिन्हा जमकर नीतीश कुमार पर निशाना साध रहे थे. सम्राट चौधरी ने तो पगड़ी ही बांध ली कि नीतीश कुमार को सत्ता से हटाए ये पगड़ी नहीं उतारेंगे.
अमित शाह की हुंकार
नवादा के हिसुआ के जनसभा में भाजपा नेता और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने फिर दोहराया कि आप लोगों और ललन बाबू को ये स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि नीतीश कुमार के लिए भाजपा के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो चुके हैं. और यह भी कहा कि कुमार कभी भी प्रधानमंत्री बनने के अपने सपने को पूरा नहीं कर पाएंगे क्योंकि इस पद के लिए कोई रिक्ति नहीं है. लेकिन हुआ क्या? एनडीए गठबंधन से जदयू के अलग होने के बाद बीजेपी प्रदेश नेतृत्व अपने तमाम गठबंधन दल के साथ केंद्रीय नेतृत्व को यह भरोसा नहीं दिला पाया कि 2024 का प्रदर्शन 2019 लोकसभा चुनाव के परिणाम जैसा होगा.
जेडीयू की महता
राजद के 30 प्रतिशत वोट बैंक के साथ अन्य पिछड़ा और दलित का एक हद तक मिलने वाले वोट का नुकसान के बारे में बताया. और साथ ही जातीय सर्वे और आरक्षण के बढ़े प्रतिशत के कारण पिछड़ा और अति पिछड़ा वोट बैंक पर महागठबंधन का रंग जब चढ़ते दिखा. तब एक बार फिर अमित शाह की रणनीति नीतीश कुमार के बगैर बिहार फतह की धरी की धरी रह गई. फिर नीतीश कुमार से ही हाथ मिलाना पड़ा. नतीजा ये हुआ कि जदयू 16 सीटों पर लड़कर 12 जीती और भाजपा 17 पर लड़कर 12। स्ट्राइक रेट भी जदयू का ही ज्यादा रहा.
यूपी बिहार में अंतर
द भारत न्यूज़ के संपादक तथा राजनीतिक विश्लेषक सुनिल प्रियदर्शी का मानना है कि बिहार जमुनी-गंगा सभ्यता का बड़ा ही मजबूत राज्य है. यहां केवल धर्म के नाम पर क्लियर मैंडेट पाना कठिन है. सामाजिक न्याय के नाम पर बिहार में दलित और पिछड़ी जाति का आपसी तालमेल काफी मजबूत है. इन पर भगवा रंग चढ़ने में अभी काफी समय लगेगा. यही वजह है कि बिहार में अमित शाह का प्रयास अब तक असफल रहा है. पर भाजपा का यह पुराना शगल रहा है कि भगवा रंग चढ़ाने को लेकर काफी संयम से काम करती है. अमित शाह भी संयम रखने वाले हैं. दिल्ली फतह की रणनीति से समझा जा सकता है. अमित शाह का अगला टारगेट बिहार है.