पी.के के नाम से मशहूर प्रशांत किशोर (Prashant Kishore) पहले दूसरी पार्टियों के लिए कैंपेन चलाते थे. अब खुद अपनी पार्टी चला रहे हैं. उनकी पार्टी जन सुराज इन दिनों बिहार में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव से पहले काफी सुर्खियों में है. वो खुद को इस बार राजद और जदयू के बाद तीसरा सबसे मजबूत प्रतिभागी बता रहे हैं.

पीके ने अपनी पदयात्रा गांधी जयंती के दिन शुरू की थी. उन्होंने अपनी विचारधारा और पार्टी की नीतियों को सार्वजनिक नहीं किया है. लेकिन बातचीत में वो गांधी, आंबेडकर, लोहिया और जेपी की विचारधारा की बात करते रहते हैं. वही उनके बयानों में लोहियावादी समाजवादियों के उस नारे की झलक मिल रही है, ‘जिसकी जितनी हिस्सेदारी, उतनी उसकी भागीदारी’. जो अब तक अन्य दल इससे अछूते रहे हैं.
केजरिवल वाले फॉर्मूले पर सीएम बनना चाहते है पीके
बिहार में दूसरे दलों का वोट बैंक तोड़कर अपनी राजनीति चमकाने की कवायद पहले भी कई पार्टियों ने की है. लेकिन इसमें उन्हें सफलता नहीं मिली है. इसलिए शायद प्रशांत किशोर (Prashant Kishore) इस बार जाति-आधारित चुनाव को वर्ग-आधारित बनाने की कोशिश कर रहे हैं.

वह पिछले 35 सालों में नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव के शासन में विकास की कमी को प्रमुखता से उठा रहे हैं. उनकी रणनीति है कि बिहार के मतदाताओं को जाति की बजाय विकास और रोजगार जैसे मुद्दों पर एकजुट किया जाए.
हालंकी बिहार की सियासत हमेशा से देश की राजनीति के केंद्र में रही है. यहां की राजनीति में जातीय समीकरण, क्षेत्रीय प्रभाव और विकास के मुद्दे हमेशा चर्चा में रहते हैं. इसलिए पीके अपने भाषणों में पलायन, गरीबी, बेरोजगारी जैसे मुद्दे उठाकर लोगों से जुड़ने की कोशिश करते नजर आ रहे हैं.
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राजद और जेडीयू के वोट बैंक में सेंधमारी की तैयारी
बिहार चुनाव में एक तरफ जहा राजद के पास पहले से अपना मुस्लिम वोट बैंक हैं, वही जेडीयू के पास भी मुस्लिम आबादी वाले इलाके में अच्छी खासी पकड़ हैं. लेकिन इस बार पीके (Prashant Kishore) दोनों दलों के इस वोट बैंक को साधने के लिए अपने प्लान के मुताबिक शतरंज के मुहरे तैयार कर रहे हैं. चुकी जिस अनुपात में पीके इस बार मुसलमानों को टिकट देने की बात कर रहे हैं. इससे साफ तौर पर जाहीर होता हैं कि राजद और जेडीयू में सेंधमारी होने वाली हैं.
दूसरी पार्टियों का कैंपेन चलाते-चलाते अब बिहार की राजनीति चलाने की कवायद में लगे प्रशांत किशोर की राहे कितनी आसान है ये तो वक्त ही बताएगा. फिलहाल ये साफ साफ तो जरूर दिख रहा हैं कि राजद और जदयू के वोट बैंक नुकसान पहुंचा ही सकते है. हालांकि अब यह आने वाला समय ही बताएगा कि बिहार की चुनावी राजनीति में प्रशांत किशोर को कितनी सफलता मिलती है.


