राजपुर विधानसभा (Rajpur Assembly) बिहार के 243 विधानसभा सीटों में से एक है। जो अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं। इस सीट पर अब तक विभिन्न दलों के उम्मीदवारों ने अपनी किस्मत आजमाई है। जिनमे कांग्रेस, बीजेपी, और जनता दल (यूनाइटेड) शामिल है. हाल के वर्षों में यह सीट महागठबंधन और जेडीयू के लिए महत्वपूर्ण रही है.

साल 2025 के नवंबर में यहाँ चुनाव होने हैं। इस बार बिहार में एनडीए बनाम महागठबंधन के बीच कडा मुकाबला होने वाला हैं। आपको बता दें कि एनडीए में JDU, RLM, BJP, HAM, LJP चिराग पासवान की पार्टी शामिल है। वही महागठबंधन में RJD, VIP, CONG, CPI, CPIM, CPIML, LJP पशुपति पारस कि पार्टी शामिल है। राजपुर विधानसभा सीट बटवारे को लेकर दोनों दलों के बीच मंथन जारी हैं। हालंकी महागठबंधन का इस सीट पर पहले से कब्जा है।
बिना दल का बैठक किये राजपुर सीट की घोषणा
इस बार राजपुर विधानसभा सीट को एनडीए हर हाल में जीतने की मूड में हैं। मगर ईससे पहले कि इस सीट पर कोई नजर गड़ाए. उससे पहले ही नीतीश कुमार ने बिना दल के बैठक किये ही, इस सीट पर जेडीयू से दो बार के विधायक रह चुके, पूर्व मंत्री संतोष निराला के नाम की घोषणा कर दी। उसके बाद से अब निराला मैदान में उतर चुके हैं।

नीतीश के इस घोषणा के बाद से क्षेत्र में बवाल मच गया। एनडीए में शामिल उपेन्द्र कुशवाहा की पार्टी RLM के कार्यकर्ताओ में इसका काफी विरोध देखने को मिल रहा हैं। उनका साफ तौर पर कहना है कि हिस्सेदारी के अनुसार राजपुर विधानसभा सीट RLM के खाते में जाना चाहिए। और वो अपने उम्मीदवार के तौर पर शुकुल राम को दावेदार मानते हैं।
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एनडीए के दो नेताओ का दनादन दौरा
संतोष निराला के कंधे पर जब से नीतीश कुमार ने हाथ रखा है तब से निराला मैदान में एक्टिव हो गए हैं। वही राष्ट्रीय लोक मोर्चा के तरफ से दावेदार शुकुल राम ने भी अपनी फील्डिंग शुरू कर दी है। इन दोनों नेताओ के दनादन दौरे से राजपुर की जनता में काफी असमंजस्य छाया हुवा है कि किस उम्मीदवार को एनडीए का उम्मीदवार माना जाए।
राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो नीतीश कुमार के इस फैसले के बाद उपेन्द्र कुशवाहा भी इस सीट को लेकर एक्टिव हो गए हैं। हालांकि कुशवाहा गंभीर नेता है। शायद वो इसलिए अभी तक चुप है कि एनडीए में सीट शेयरिंग को लेकर ये सुनिश्चित नहीं हुवा है कि राजपुर विधानसभा सीट किसके खाते में जाएगा। सूत्रों कि माने तो चुनाव से पहले एनडीए में शामिल दो दलों की ये तकरार एनडीए के सेहत के लिए ठीक संकेत नहीं हैं। अब देखना ये हैं कि उपेन्द्र कुशवाहा के जिद के आगे जेडीयू नतमस्तक होती है या फिर कोई नया बखेड़ा का आगाज होता हैं।


