बिहार की राजनीति (Bihar Politics) में वंशवाद पर एक-दूसरे को आईना दिखाने वाले राजनीतिक दल भी इस रोग से अछूते नहीं. विधानसभा हो या लोकसभा, वंशवाद की फसल हर जगह लहलहा रही. बिहार में अभी 27 प्रतिशत सांसद और विधायक अपने परिवार की राजनीति को आगे बढ़ा रहे. यह संख्या राष्ट्रीय औसत (21 प्रतिशत) से भी अधिक है.

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी मांग पर कांग्रेस के आक्षेप के बीच वंशवाद का मुद्दा फिर ताजा हो गया है. ऐसे में वंशवादी पृष्ठभूमि वाले सांसदों-विधायकों का आकलन करती एसोसिएशन फार डेमोक्रेटिक रिफाम्सर्स (ADR) की ताजा रिपोर्ट प्रासंगिक है.
क्या है एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफाम्सर्स की रिपोर्ट में
रिपोर्ट बता रही कि बिहार (Bihar Politics) के 360 सांसदों और विधायकों में से 96 किसी-न-किसी राजनीतिक परिवार के हैं. क्षेत्रीय दलों को तो यह रोग कुछ अधिक ही है. रिपोर्ट बताती है कि वंशवाद केवल सीटों की विरासत नहीं है, बल्कि यह भारतीय राजनीति का ढांचा बन चुका है. प्रत्याशियों के चयन में जीत की गारंटी, चुनावों का महंगा होना और दलों में आंतरिक लोकतंत्र की कमी, इसके बड़े कारण हैं.

पार्टियां अक्सर उन्हीं राजनेताओं को प्राथमिकता देती हैं, जिनके पास पहले से धनबल-बाहुबल और संगठनात्मक नेटवर्क है. हालांकि, राजनीति पर वंशवाद का आक्षेप के बीच यह प्रश्न भी प्रासंगिक है कि अगर किसी अफसर, इंजीनियर-डाक्टर की संतान उसी पेशे को अपनाकर सम्मान पा रही तो राजनेताओंं के संदर्भ में यह विभेद क्यों? इसका उत्तर योग्यता और दक्षता है.
राष्ट्रीय स्तर पर वंशवाद
बिहार की सत्ता (Bihar Politics) में बैठा हर पांचवा नेता वंशवादी राजनीतिक की देन है. देश में कुल 5,204 मौजूदा सांसदों, विधायकों और विधान परिषद सदस्यों में से 1,107 यानि 21 प्रतिशत नेता वंशवादी पृष्ठभूमि वाले हैं.
लोकसभा में वंशवाद सबसे गहरा है, जहां 31 प्रतिशत सांसद राजनीतिक परिवारों से आते हैं. राज्यसभा में यह 21 प्रतिशत और विधान परिषदों में 22 प्रतिशत है. राज्य विधानसभाओं में यह संख्या अपेक्षाकृत कम है, लेकिन वहां भी यह संख्या 20 प्रतिशत तक पहुंच रही.
बिहार में वंशवाद का इतिवृत्त
बिहार की राजनीति (Bihar Politics) में परिवारवाद 1990 से हावी होता गया. कांग्रेस ने इसका बीजारोपण किया, जबकि राजद के खाद-पानी से यह बेल पसर गई.
राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने इसे शुरू में नकारा, लेकिन हाल के वर्षों में भाजपा-जदयू में भी वंशवाद का बोलबाला हो गया. लोजपा और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा तो परिवारवाद के पुरोधा बन गए हैं. इस मुद्दे पर मुखर रहने वाली जन सुराज पार्टी के नाम अभी कोई चुनावी उपलब्धि तो नहीं, लेकिन उसके भी राष्ट्रीय अध्यक्ष उदय सिंह राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले परिवार से हैं.
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वंशवाद का दलवार ब्योरा
| पार्टी | संख्या (प्रतिशत में) |
|---|---|
| कांग्रेस | 32% |
| राजद | 31% |
| भाकपा | 14% |
| भाकपा (माले) | 13% |
| माकपा | 8% |
| एआइएमआइएम | 33% |
| भाजपा | 17% |
| जदयू | 31% |
| लोजपा (रामविलास) | 50% |
| हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा | 50% |
महिला नेताओं में वंशवाद
राष्ट्रीय स्तर पर कुल महिला सांसदों और विधायकों में से 47 प्रतिशत राजनीतिक परिवार से हैं, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा 18 प्रतिशत है. बिहार में कुल 44 महिला सांसदों-विधायकों में से 25 वंशवादी पृष्ठभूमि से आती हैं. यह आंकड़ा 57 प्रतिशत बनता है. पुरुषों में यह संख्या 22 प्रतिशत ही है. 316 पुरुष सांसदों-विधायकों में से 71 राजनीतिक परिवार से हैं.


